Jashn E Bharan -- Pustak-Samiksha : Atulya Khare
. Pustak Samiksha : Atulya Khare
समीक्षित पुस्तक : जश्न-ए-बहारां
विधा : उपन्यास
द्वारा : राजेन्द्र राजन
अद्विक पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित
प्रथम प्रकाशन वर्ष : 2024
मूल्य : 190.00
समीक्षा क्रमांक : 250
वारिष्ट उपन्यासकार राजेंद्र राजन जी द्वारा रचित “जश्न- ए- बहारां ” केवल एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि हालिया तथाकथित आधुनिक परिवेश में स्त्री-पुरुष संबंधों के बदल रहे समीकरणों का एक सूक्ष्म, मनोवैज्ञानिक, क्लिष्ट पृष्ट दर्शाता हुआ कथानक है, जहां शारीरिक संबंधों को वर्तमान स्वार्थ प्रमुख की सोच अथवा परिवेश ने एक नई व्याख्या दी है। क्या किसी महिला द्वारा सफलता हासिल करने के लिए देह समर्पण एवं कार्य सम्पन्न हो जाने पर अर्थात तथाकथित सफलता की ऊँचाई हासिल कर लेने पर, उस पुरुष को तिरस्कृत कर दिया जाना उचित है जो पग पग पर उसकी उन्नति में सहायक रहा, विषय को प्रमुखता से अत्यंत रोचक कथानक में प्रस्तुत किया गया है ।
यूं तो स्त्री-विमर्श पर बहुत कुछ लिखा एवं पढ़ा जाता है किन्तु यदि प्रस्तुत उपन्यास को मैं पुरुष विमर्श अथवा अधिक स्पष्टता की दृष्टि से पुरुष शोषण की श्रेणी में परिभाषित करूँ तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
कथानक, आधुनिक प्रतिस्पर्धा के युग में, जहां व्यक्ति येन-केन प्रकारेण सफलता हासिल करने की धुन में रीति, नीति, संस्कार सब भुला बैठा है, वहाँ संबंधों की क्लिष्टता, व्यक्ति की अति महत्वाकांक्षा एवं स्वार्थ सिद्धि को बखूबी दर्शाता है, वहीं शारीरिक संबंधों को भावुकता, नैतिकता एवं पुरातन मान्यताओं से विलग रख एक नए ही नज़रिये से देखने का गर्भित सुझाव भी है।
उपन्यास के केंद्र में स्मृति (नायिका) एवं शेष का संबंध है, जो एक ओर अति भावुकता और दूसरी ओर हृदय-भावना हीन
यथार्थ के बीच की कशमकश दर्शाता है। लेखक के द्वारा कहानी में स्मृति के माध्यम से एक ऐसी महिला का चरित्र प्रस्तुत किया गया है जो प्रगतिशील तो है ही, अति महत्वाकांक्षी होने के कारण प्रेम और देह को मात्र सफलता की सीढ़ियाँ मानती है। उसके लिए देह का समर्पण किसी भी प्रकार के आत्मिक जुड़ाव का परिणाम नहीं, बल्कि वह तो मात्र स्वार्थ पूर्ति हेतु किया गया निवेश है।
स्मृति के पात्र द्वारा लेखक ने एक ऐसी अति व्यावहारिक आधुनिक महिला का परिचय दिया है जो एक पुरुष को, जो उसके शरीर समर्पण को प्रेम मान बैठा है एवं पूर्णतः उसके प्रति समर्पित पुरुष है, का उपयोग कर अपनी
उन्नति सुनिश्चित कर लेती है,और फिर उसे तिरस्कृत कर देना उसके लिए एक व्यावहारिक प्रक्रिया है न की किसी भी स्तर पर भावनात्मक जुड़ाव। यह उस तथाकथित आधुनिक यूज एण्ड थ्रो नीति को चित्रित करता है जहाँ व्यक्ति केवल तब तक ही उपयोगी एवं प्रासंगिक हैं जब तक वह उसकी स्वार्थ सिद्धि या लक्ष्य प्राप्ति में सहायक हैं।
दूसरी ओर, कथानायक शेष, एक पारंपरिक मान्यताओं को मानने वाला पुरुष है, उम्र में स्मृति से छोटा होने के बावजूद, निश्छल प्रेम की परिधि की गिरफ्त में भावनात्मक समर्पण करता है (भावनात्मक समर्पण इसलिए क्यूंकि उसके भी कई महिलाओं से संबंध रहे है तथा शारीरिक संबंधों के विषय में उसकी शुचिता तो खैर नहीं ही है नैतिकता भी स्पष्ट नहीं है। स्मृति द्वारा उसे पूर्णतः इस्तेमाल करना, फिर काम निकल जाने पर उसे अनदेखा करना और अंत में संबंध (?) तोड़ लेना, शेष को भी कहीं न कहीं मानसिक रूप से तोड़ देता है।
शेष के मानसिक अवसाद की अवस्था को बार बार संपर्क करने के उसके प्रयासों के माध्यम से लेखक ने बखूबी सामने रखा है। यहाँ यह भी विचारणीय है की जब स्त्री पुरुष संसर्ग, शारीरिक सुख या स्त्री-संग कोई दुर्लभ या नई चीज़ नहीं है, फिर शेष का स्मृति के प्रति पागलपन की हद तक का दीवानापन मात्र बौद्धिक जुड़ाव अथवा समान रुचि होने के कारण हुआ हो ऐसा तो प्रतीत नहीं होता।
कथानक के प्रारंभ में ऐसा प्रतीत होता था मानों स्मृति, शेष के लिए केवल एक देह नहीं थी, बल्कि कला के क्षेत्र में तथा बौद्धिक स्तर पर भी उसे समझने वाली एक ऐसी स्त्री थी जिससे रूबरू मिलने के पहले उसने लंबी बातचीत करी हुई थी। संभवतः यह बौद्धिक नजदीकियाँ एवं उस से एक बेहतर तालमेल एवं समझ का एहसास उसके लिए शारीरिक सुख से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए थे। वहीं स्मृति द्वारा अपने वैवाहिक जीवन में स्वयं को प्रताड़ित दर्शाना भी उसे शेष से मानसिक रूप से करीब लाने में सहायक हुआ और शेष को उसके प्रति अधिक आकर्षित और समर्पित होने पर मजबूर कर दिया।
स्मृति द्वारा शेष को अत्यधिक महत्व दिया जाना और यह दर्शाना की वह स्मृति की जीवन-यात्रा में उसका सबसे अहम सहयोगी है, शेष को मुगालते में रखने हेतु पर्याप्त कारण रहता है। स्मृति की महत्त्वाकांक्षाओं के दिन ब दिन विस्तृत होते आकाश में खुद को उसका रक्षक, सहायक और मसीहा समझ लेना शेष की एक ऐसी मानसिक स्थिति थी, जहाँ वह अपने अस्तित्व को स्मृति के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के साथ जोड़ कर स्वयं को भुला चुका था।
वहीं स्मृति द्वारा उसे क्रूरता और अपमान के साथ छोड़ देने पर उत्पन्न पीड़ा, सिर्फ प्रेम के खोने की नहीं थी अपितु यह तो वह भाव था, जिसमें उपयोग होने का एहसास खुलकर सामने आ जाता है। जिसने उस को टूटन और बिखराव के गर्त में डुबाया।
संक्षेप में देखें तो शेष का दीवानापन या पागलपन शारीरिक आकर्षण से कहीं आगे निकलकर बहुत कुछ खोने का डर था जिसमें वह सम्मान और महत्व भी शामिल हैं जो उसे स्मृति के जीवन में एक अहम भूमिका में रहने का आभास दिलाते थे। भले ही वह शारीरिक संबंधों का अभ्यस्त था किन्तु स्मृति ने जिस तरह से उसे भावनात्मक एवं बौद्धिक स्तर पर जीता अथवा छला वह भी उसे स्मृति की ओर खींचने और अंततः उसके लिए व्याकुल करने के लिए बहुत हद तक या संभवतः पूर्णतः जिम्मेवार है।
उपन्यास अपने हर मोड पर मानसिक रूप से उद्वेलित करता है एवं सफलता पूर्वक यह स्थापित करता है की प्रेम की आधुनिक परिभाषा केवल संबंधित व्यक्ति (पुरुष अथवा स्त्री) की उपयोगिता पर टिकी है। स्मृति की महत्वाकांक्षा एवं शेष को उस से दूर होने का दर्द, वर्तमान समाज की उस नई विचार धारा को पुष्ट करता है जहां व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए भावनाएं एवं संवेदनाएं मूल्य हीन हो गई हैं।
लेखक द्वारा सम्पूर्ण कथानक में नायिका की मनोदशा और उससे जुड़े वैयक्तिक सफलता जैसे कारणों की जिस गहनता से व्याख्या की गई है, उसकी मानसिकता को गहराई से समझने का प्रयास किया है वह इस कृति को एक कठिन मानसिक संघर्ष दर्शाता हुआ प्रभावी और सफल रचना बनाता है।
बात करे मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से जश्न-ए-बहाराँ में नायिका स्मृति के चरित्र की तो यह बेहद स्पष्ट है कि उसके संबंध उपयोगिता एवं सिर्फ उपयोगिता पर आधारित हैं। स्मृति की मानसिकता से सहज ही उसका अति-महत्वाकांक्षी होना स्पष्ट है। उसके लिए, पुरुष उसके लिए क्या कर सकता है यह महत्वपूर्ण है ना की उसका व्यक्तित्व अथवा उसकी भावनाएं।
यही कारण है की ज्यों ही उसे यह प्रतीत होता है की वर्तमान साथी उसके लिए अनुपयोगी हो चुका है उसके स्वार्थ सिद्धि में और अधिक सहायक न होगा, वह बिना किसी संकोच अथवा हिचक या लगाव के सहज ही दूसरे पुरुष की ओर बढ़ जाती है फिर यह प्रेम कहाँ हुआ, यह तो एक सीढ़ी की तरह संबंधों का उपयोग ही हुआ।
वरिष्ट उपन्यासकार राजन जी के इस पात्र की मानसिकता में लगाव, जुड़ाव अथवा प्रेम एक अस्थायी अवस्था है जो जीवन में लक्ष्य बदलने के साथ परिवर्तित हो जाती हैं। लक्ष्य के बदलते ही साथी बदलते हैं और उसके साथ ही वह पिछले संबंध से जुड़ी सभी स्मृतियों और भावनाओं को पूरी तरह से शून्य कर देती है, जो उसकी मानसिक, चारित्रिक एवं भावनात्मक कठोरता दर्शाता है।
पुस्तक के अंत में शेष द्वारा स्मृति को लिखे गए पत्र के द्वारा स्मृति के चरित्र को और अधिक खुलकर समझने के अवसर मिलते हैं। यह तो स्पष्ट ही है की उसके संबंध उपयोगिता आधारित हैं, तब वह व्यक्ति तो कभी संतुष्ट हो ही नहीं सकता ज्यों ही उस की मानसिक संरचना में कुछ नया और कुछ बड़ा पाने की आकुलता उभरेगी वह नए आलम्ब को तलाश लेगी जो उसके स्वार्थ सिद्धि में सहायक हो और उसके साथ ही पुराने आलम्ब, सहारे का तिरस्कार प्रारंभ हो जाएगा अर्थात उसके अत्यधिक महत्वाकांक्षी जीवन, हृदयहीन होने भावहीन होने तथा अपना "स्व" सर्वोपरि रखने के स्वभाव के कारण उसके संबंध कभी भी किसी से भी स्थायी नहीं प्रतीत होते। प्रत्येक नया साथी उसके लिए नई ऊँचाइयों तक ले जाने की एक सीढी ही है वह उसे एक सहयोगी नहीं अपितु एक संसाधन के रूप में देखती है।
व्यक्ति का महत्वाकांक्षा को प्रमुखता देना एवं अन्य की भावनाओं के प्रति पूर्णतः संवेदनाहीन होना और यह मानसिकता, की अपनी सफलता के लिए किसी अन्य का उपयोग उसका अधिकार है नार्सीसिज्म (एक ऐसी अवस्था जो कि मूलतः एक भावनात्मक विकृति ही है , जिसमें व्यक्ति आत्म महत्व के सुख में डूबा रहता है, उसका स्व सर्वोपरि होता है , वह इसी भ्रम में रहता है कि वही सबसे श्रेष्ट, खास अद्वितीय एवं महत्वपूर्ण है तथा उसे हक है दूसरे का उपयोग करने का , उसे संसाधन समझने का ) के लक्षणों के करीब है। वहीं उसकी यह मानसिकता, पुरुष को सीढ़ी मानती है, स्पष्टतः उसकी भावनात्मक विकृति की ओर इंगित करती है। वहीं प्रगति हेतु निरंतर सहारे की तलाश उसकी मानसिक असुरक्षा को भी दर्शाता है।
अतः कह सकते है की स्मृति के चरित्र के द्वारा वरिष्ठ उपन्यासकार राजन जी ने एक ऐसी गंभीर समस्या को उठाया है जो सामान्य होते हुए भी असामान्य है। उनकी नायिका ने अपने प्रगतिशीलता के मुखौटे के पीछे अपनी अवसरवादिता, स्वार्थ वाद की भावनाओं को छिपाया हुआ है। लेखक ने सूक्ष्मता से उसके उन्मुक्त आचरण (देह उत्सव) को चित्रित किया है उससे यह तो बखूबी स्पष्ट है कि वह प्रेम तो कदापि नहीं कर रही है अपितु अपनी महत्वाकांक्षा की सिद्धि की ओर कदम बढ़ा रही है।
अतुल्य खरे










टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें